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श्री काकभुशुण्डि जी द्वारा माया दर्शन की कथा

श्री काकभुशुण्डि जी द्वारा माया दर्शन की कथा


Maya Darshan By Kakbhushundi

दूसरो की मैं क़्या कहूँ मुझे भी प्रभु ने सम्मोहिनी जाल में ऐसा बाँध लिया है कि पढ़ने वाले कहां तक पढ़े -पढ़ने से त्रस्त ~और मजबूर मैं लिखने में मस्त ~कैसा हरि का सम्मोहन
हाँ यहां प्रभु की अति प्रबल माया जिसने श्री कागभुशुंडी जी को भी नचाया की चर्चा ,हम कर रहे है ~श्री कागभुशुंडी जी की कथा -राम चरित मानस उत्तर कांड दोहा 73 से 85 में है

माया बस्य जीव अभिमानी , ईस बस्य माया गुनखानी ।
परबस जीव स्वबस भगवंता ,जीव अनेक एक श्री कंता ।।
अभिमानी जीव माया के बस में है और गुणों से भरी हुई माया प्रभु की चेरी है ~जीव परबस है और भगवान् स्वतंत्र है ~ जीव प्राणी अनेक है परंतु लक्ष्मीपति एक ही है ।
जीव का अभिमान , फिर श्री हरि की मुस्कराहट नतीजा महामाया के मोहजाल में फंसना

~कागभुशुण्डी अमर है ~वे हर कल्प में अयोध्या जाकर प्रभु की बाल लीला के दर्शन करते थे ~एक बार पभु की बाल लीला देखकर उन्हें मोह हो गया कि प्रभु यह कैसी लीला कर रहे हैं~
मोह होते ही उन्होंने श्री राम जी के हाथो को उन्हें पकड़ने को पास आते देखा ~सारे ब्रम्हांड में वे भागते फिरे परंतु प्रभू के हाथ से बच न सके और प्रभु के हँसते ही प्रभु के मुख में चले गए

राम उदर देखेउ जग नाना , देखत बनई न जाइ बखाना ।
~श्री राम के पेट में कागभुसुंडी ने अनेक एक से एक विचित्र ब्रम्हांड ~कोटिन्ह चतुरानंन ब्रम्हा ~कोटिन्ह गौरीशा शंकर~अगणित रवि सूर्य और चंद्रमा ~अगनित लोकपाल ~अपार श्रष्टी ~आदि देखे ~~

जो नहि देखा नहि सुना जो मनहु न समाय ~सो सब अद्भुत देखेउँ बरनि कवन बिधि जाइ।
एक एक ब्रम्हांड महूँ रहउँ बरष सत एक ~ एही बिधि देखत फिरेउ मैं अंड कटाह अनेक ।।

प्रति ब्रम्हांड में अलग अलग अयोध्या और राम के जन्म को देखा परंतु आश्चर्य ~हर ब्रम्हांड में श्री राम एक ही थे !!! इस प्रकार सभी ब्रम्हांडो में घूमते हुए काग भुशुण्डी को सात कल्प बीत गए ~

कागभुशुण्डि को बहुत व्याकुल होता देखकर बाल रूप मे श्री राम हंसे औऱ उनके हंसते ही
कागभुशुण्डि श्री राम के उदर से बाहर आ गए ~इस सब लीला को उन्होंने आधी घड़ी में देखा ~

श्री राम ने प्रसन्न होकर कागभुशुण्डि को अबिरल भगति का वरदान और फिर कभी माया के न व्यापने का वरदान दिया ।
पहले विद्वान् लोग इस वर्णन को माइथोलॉजी कह कर कहानिया मानते थे ~अब इस परम सत्य को कि जिसका वर्णन कागभुसुंडि ने किया है मानने को मजबूर हो गए है ~ब्रम्हांड की सीमा की कल्पना ही असंभव है ~करोडो आकाशगंगाये जिनमे करोडो सूर्य चाँद गृह आदि है ~

जो नहि देखा नहि सुना , जो मनहुँ न समाय ~~आश्चर्य की बात है कि नही~यह सत्य भारतीयो को हजारो सालो से पता था ~और पश्चिमी सभ्यता के व्यक्ति इसे माइथोलॉजी कह कर हमारी हंसी उड़ाते थे ~
अहंकार ,अभिमान से ~अपने को सर्वशक्तिमान GOD या MASSENGER OF
GOD समझने की, सुपरमैन दिखाने की कोशिश , और ~दूसरो को नीचा दिखाने या उनका अपमान करने की ~~~""प्रभु की माया"" ऎसी सजा देगी ~~ आपसब देख ही रहे है ~
""हरि माया कृत दोष गुन , बिनु हरि भजन न जांहि ।
. भजिय राम तजि काम सब , अस बिचारि मन मांहि ।।"" ( राम नाथ गुप्त कन्नौज)

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