देवर्षि को दर्शन दिए जगज्जननी श्रीराधा
वीणा की झनकार पर हरि-गुण-गान करते हुए देवर्षि नारद व्रज में घूम रहे हैं। कुछ देर पहले व्रजेश्वर नन्द के घर गये थे। वहाँ नन्दनन्दन श्रीकृष्णचन्द्र के उन्होंने दर्शन किये। दर्शन करने पर मन में आया- जब स्वयं गोलोकविहारी श्रीकृष्णचन्द्र भूतल पर अवतरित हुए हैं तो गोलोकेश्वरी श्रीराधा भी कहीं-न-कहीं गोपीरूप में अवश्य आयी हैं। उन्हीं श्रीराधा को ढूँढ़ते हुए देवर्षि व्रज के प्रत्येक गृह के सामने ठहर-ठहरकर आगे बढ़ते जा रहे हैं। देवर्षि का दिव्य ज्ञान कुण्ठित हो गया है, सर्वज्ञ नारद को श्रीराधा का अनुसंधान नहीं मिल रहा है; मानो योगमाया देवर्षि को निमित्त बनाकर राधा-दर्शन की यह साधना जगत् को बता रही हो, पहले श्रीकृष्णचन्द्र के दर्शन होते हैं, उनके दर्शनों से श्रीराधा के दर्शन की इच्छा जाग्रत् होती हैं; फिर श्रीराधा को पाने के लिये व्याकुल होकर व्रज की गलियों में भटकना पड़ता है। अस्तु, घूमते हुए देवर्षि वृषभानु--प्रासाद के सामने आकर खड़े हो जाते हैं। वह विशाल मन्दिर देवर्षि को मानो अपनी ओर आकर्षित कर रहा हो। देवर्षि भीतर प्रवेश कर जाते हैं। वृषभानु गोप की दृष्टि उन पर पड़ती है वे दौड़कर नारद के चरणों में लोट जाते हैं।
विधिवत् पाद्य-अर्घ्य से पूजा करके देविर्षि को प्रसन्न अनुभव कर वृषभानु गोप अपने सुन्दर पुत्र श्रीदाम को गोद में उठा लाते हैं, लाकर मुनि के चरणों में डाल देते हैं। बालक का स्पर्श होते ही मुनि के नेत्रों में स्नेहाश्रु भर आता है; उत्तरीय से अपनी आँखें पोंछकर उसे उठाकर वे हृदय से लगा लेते हैं, तथा गद्गद कण्ठ से बालक का भविष्य बतलाते हैं---वृषभानु ! सुनो, तुम्हारा यह पुत्र नन्दनन्दन का, बलराम का प्रिय सखा होगा।
तो क्या रासेश्वरी श्रीराधा यहाँ भी नहीं हैं ? वृषभानु उन्हें तो लाया नहीं ?--यह सोचकर निराश-से हुए देवर्षि चलने को उद्यत हुए। उसी समय वृषभानु ने कहा--भगवन् ! मेरी एक पुत्री है, सुन्दर तो वह इतनी है मानो सौन्दर्य की खानि कोई देवपत्नी इस रूप में उतर आयी हो। पर आश्चर्य यह है कि वह अपनी आँखें सदा निमीलित रखती है, हम लोगों की बातें भी उसके कानों में प्रवेश नहीं करतीं, उन्मादिनी-सी दीखती है; इसलिये हे भगवत्तम ! श्रीचरणों में मेरी यह प्रार्थना है कि एक बार अपनी सुप्रसन्न दृष्टि उस बालिका पर भी डालकर उसे प्रकृतिस्थ कर दें।
आश्चर्य में भर नारद वृषभानु के पीछे-पीछे अन्तःपुर में चले जाते हैं। जाकर देखा--स्वर्ण निर्मित सजीव सुन्दरतम प्रतिमा-सी एक बालिका भूमि पर लोट रही है। देखते ही नारद का धैर्य जाता रहा, अपने को वे किसी प्रकार भी संवरण न कर सके; वे दौड़े तथा बालिका को उठाकर उन्होंने अंक में ले लिया। एक परगानन्द-सिन्धु की लहरें देवर्षि को लपेट लेती हैं, उनके प्राणों में अननुभूत पूर्व एक अदभुत प्रेम का संचार हो जाता है, वे बालिका को क्रोड़ में धारण किये मूर्छित हो जाते हैं। दो घड़ी के लिये तो उनकी यह दशा है, मानो उनका शरीर एक शिलाखण्ड हो। दो घड़ी के पश्चात् जाकर कहीं बाह्यज्ञान होता है तथा बालिका अप्रतिम सौन्दर्य निहारकर विस्मय की सीमा नहीं रहती। वे मन-ही-मन सोचने लगते हैं-ओह ! ऐसे सौन्दर्य के दर्शन मुझे तो कभी नहीं हुए। मेरी अवाध गति है, सभी लोकों में स्वच्छन्द विचरता हूँ; ब्रह्मलोक, रुद्रलोक, इन्द्रलोक-इनमें कहीं भी इस शोभासागर का एक बिन्दु भी मैंने नहीं देखा; महामाया भगवती शैलेन्द्रनन्दिनी के दर्शन मैंने किये हैं, उनका सौन्दर्य चराचर-मोहन है; किंतु इतनी सुन्दर तो वे भी नहीं ! लक्ष्मी, सरस्वती, कान्ति, विद्या आदि सुन्दरियाँ तो इस सौन्दर्य-पुञ्ज की छाया भी नहीं छू पातीं विष्णु के इस- विमोहन उस मोहिनी रूप को भी मैंने देखा है, पर इस अतुल रूप की तुलना में वह भी नहीं। बालिका को देखते ही श्रीगोविन्द- चरणाम्बुज में मेरी जैसी प्रीति उमड़ी, वैसी आज तक कभी नहीं हुई। बस, बस, यही श्रीराधा हैं, निश्चय ही यही श्रीरासेश्वरी हैं।-देवर्षि का अन्तर्हृदय आलोकित हो उठा।
वृषभानु ! कुछ क्षण के लिये तुम बाहर चले जाओ; बालिका के सम्बन्ध में मैं कुछ करना चाहता हूँ-गद्गद कण्ठ से देवर्षि ने धीरे-धीरे कहा। सरलमति वृषभानु देवर्षि को प्रणाम कर बाहर चले आये। एकान्त पाकर नारद ने श्रीराधा का स्तवन आरम्भ किया-'देवि ! महायोगमयि ! महाप्रभामयि ! मायेश्वरि ! मेरे महान् सौभाग्य से, न जाने किन अनन्त शुभ कर्मों से रचित सौभाग्य का फल देने तुम मेरे दृष्टि पथ में उतर आयी हो। देवि ! ये तुम्हारे दिव्य अंग अत्यन्त मोहन हैं, ओह ! इन मधुर अंगों से माधुर्य का निर्झर झर रहा है; इस मधुरिमा का एक कण ही उस महाद्भुत रसानन्दसिन्धु का सृजन कर रहा है, जिसमें अनन्त भक्त अनन्त काल तक स्नान करते रहेंगे। देवि ! तुम्हारे इन निमीलित नेत्रों से भी सुख की वर्षा हो रही है, वह सुख बरस रहा है?- जो नित्य नवीन है। मैं अनुभव कर रहा हूँ, तुम्हारे अन्तर्देश में सुख का समुद्र लहरा रहा है; उसी की लहरें नेत्रों पर, तुम्हारे इस प्रसन्न, सौम्य, मधुर मुखमण्डलपर नाच रही हैं।
देवर्षि की वाणी काँप रही है, पर स्तवन करते ही जा रहे हैं-
तत्त्वं विशुद्धसत्त्वासु शक्तिर्विद्यात्मिका परा।
परमानन्दसंदोहं दधती वैष्णवं परम्॥
कलयाऽऽश्चर्यविभवे ब्रह्मरुद्रादिदुर्गमे।
योगीन्द्राणां ध्यानपथं न त्वं स्पृशसि कर्हिचित्॥
इच्छाशक्तिज्ञ्ञानशक्तिः क्रियाशक्तिस्तवेशितुः।
तवांशमात्रमित्येवं मनीषा मे प्रवर्तते॥
आनन्दरूपिणी शक्तिस्त्वमीश्वरि न संशयः।
त्वया च क्रीडते कृष्णो नूनं वृन्दावने वने ॥
कौमारेणैव रूपेण त्वं विश्वस्य च मोहिनी।
तारुण्यवयसा स्पृष्टं कीदृक्ते रूपमद्भुतम्॥
(पद्मपुराण पा०खं०)
'देवि! तुम्हीं ब्रह्म हो; सच्चिदानन्द ब्रह्म के संत्-अशम स्थित सन्धिनी शक्ति की चरम परिणति--विशुद्ध सत्व तुम्हीं हो; विशुद्ध सत्त्वमयी तुममें ही चिदंश की संवित्-शक्ति, संवित् की चरम परिणति विद्यात्मिका पराशक्ति--ज्ञानशक्ति का भी निवास है; तुम्हीं आनन्दांश की हलादिनी शक्ति, हलादिनी की भी चरण परिणति महाभावरूपिणी हो; आश्चर्यवैभवमयी ! तुम्हारी एक कला का भी ज्ञान ब्रह्म-रुद्रतक के लिये कठिन है, फिर योगीन्द्रगण के ध्यानपथ में तो तुम आ ही कैसे सकती हो। मेरी बुद्धि तो यह कह रही है, कि इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति--ये सभी तुम ईश्वरी के अंशमात्र हैं श्रीकृष्णचन्द्र की आनन्दरूपिणी शक्ति तुम्हीं हो, तुम्हीं उनकी प्राणेश्वरी हो--इसमें कोई संशय नहीं; तुम्हारे ही साथ निश्चय श्रीकृष्णचन्द्र वृन्दावन में क्रीड़ा करते हैं ओह देवि ! जब तुम्हारा कौमार रूप ही ऐसा विश्वविमोहन है, तब वह तरुण रूप कितना विलक्षण होगा !
कहते-कहते नारद का कण्ठ रुद्ध होने लगता है। प्राणों में श्रीराधा के तरुण रूप को देखने की प्रबल उत्कण्ठा भर जाती है। वे वहीं पर टँगे मणिपालने में श्रीराधा को लिटा देते हैं तथा उनकी ओर देखते हुए बारंबार प्रणाम करने लगते हैं, तरुण रूप से दर्शन देने के लिये प्रार्थना करते हैं। नारद के अन्तर्हृदय में मानो कोई कह देता है-देवर्षे ! श्रीकृष्ण की वन्दना करो, तभी श्रीकृष्ण प्रियतमा के नेत्र तुम्हारी ओर फिरेंगे। देवर्षि श्रीकृष्णचन्द्र की जय-जयकार कर उठते हैं-
जय कृष्ण मनोहारिन् जय वृन्दावनप्रिय।
जय भ्रूभंगललित जय वेणुंरवाकुल॥
जय बर्हकृतोत्तंस जय गोपीविमोहन।
जय कुङ्कुमलिप्तांग जय रत्नविभूषण॥
(पद्मपुराण पा०खं०)
---बस, इसी समय दृश्य बदल जाता है। मणिपालन पर विराजित वृषभानु कुमारी अन्तर्हित हो जाती हैं तथा नारद के सामने किशोरी श्रीराधा का विभाव हो जाता है। इतना ही नहीं, दिव्य भूषण-वसन से सज्जित अगणित सखियाँ भी वहाँ प्रकट हो जाती हैं, श्रीराधा को घेर लेती हैं। वह रूप वह सौन्दर्य !--नारद के नेत्र निमेष शून्य एवं अंग निश्चेष्ट हो जाते हैं, मानो नारद सचमुच अन्तिम अवस्था में जा पहुँचे हों।
राधाचरणाम्बुकणिका का स्पर्श कराकर एक सखी देवर्षि को चैतन्य करती है और कहती हैं---मुनिवर्य ! अनन्त सौभाग्य से श्रीराधा के दर्शन तुम्हें हुए हैं। महाभागवतों को भी इनके दर्शन दुर्लभ हैं देखो, ये अब तुम्हारे सामने से फिर अन्तर्हित हो जायँगी, प्रदक्षिणा करके नमस्कार कर लो। जाओ। गिरिराज-परिसर में, कुसुमसरोवर के तट पर एक अशोक लता फूल रही है,उसके सौरभ से वृन्दावन सुवासित हो रहा है, वहाँ उसके नीचे हम सबों को अर्द्धरात्रि के समय देख पाओगे।
श्रीराधा का वह कैशोररूप अन्तर्हित हो गया। बाल्य-रूप से रत्न पालने पर वे पुनः प्रकट हो गयीं।
द्वार पर खड़े वृषभानु प्रतीक्षा कर रहे थे। जय जयकार की ध्वनि सुनकर आश्चर्य कर रहे थे अश्रुपूरित कण्ठ से देवर्षि ने पुकारा, वे भीतर आ गये। देवर्षि बोले-वृषभानु ! इस बालिका का यही स्वभाव है; देवताओं की सामर्थ्य नहीं कि वे इसका स्वभाव बदल दें। किंतु तुम्हारे भाग्य की सीमा नहीं; जिस गृह में तुम्हारी पुत्री के चरणचिह अंकित हैं, वहाँ लक्ष्मी सहित नारायण, समस्त देव नित्य निवास करते हैं। यह कहकर स्खलित गति से नारद चल पड़ते हैं। वीणा में राधायशोगान की लहरी भरते, आँसू बहाते हुए वे अशोकवन की ओर चले गये।
उसी दिन कीर्तिदा रानी की गोद में पुत्री को देखकर प्रेम विवश हुए वृषभानु लाड़ लड़ाने लगे। नारद के गान का इतना-सा अंश वृषभानु के कान में प्रवेश कर गया था 'जय कृष्ण मनोहारिन् !' जानकर नहीं, लाड़ लड़ाते समय यों ही उनके मुख से निकल गया--जय कृष्ण मनोहारिन् ! बस, भानुकुमारी श्रीराधा आँखें खोलकर देखने लगीं। वृषभानु के हर्ष का पार नहीं, कीर्तिदा आनन्द में निमग्न हो गयीं; उन्हें तो पुत्री को प्रकृतिस्थ करने का मन्त्र प्राप्त हो गया। इससे पूर्व जब-जब नन्दगेहिनी यशोदा कीर्तिदा से मिलने आयी हैं, तब-तब भानुकुमारी ने आँखें खोल-खोलकर देखा है।
" जय जय श्री राधे "

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